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सभा पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
सर्वैरपि गुणैर्हीनो वीर्यवान्हि तरेद्रिपून् |  १०   क
सर्वैरपि गुणैर्युक्तो निर्वीर्यः किं करिष्यति ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति