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वन पर्व
अध्याय १७
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वासुदेव उवाच
एवं व्रुवति संहृष्टे प्रद्युम्ने पाण्डुनन्दन |  ३३   क
विष्ठितं तद्वलं वीर युय़ुधे च यथासुखम् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति