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सभा पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
कुले जन्म प्रशंसन्ति वैद्याः साधु सुनिष्ठिताः |  ८   क
वलेन सदृशं नास्ति वीर्यं तु मम रोचते ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति