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विराट पर्व
अध्याय ३५
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वैशम्पाय़न उवाच
ऊर्ध्वमुत्क्षिप्य कवचं शरीरे प्रत्यमुञ्चत |  १८   क
कुमार्यस्तत्र तं दृष्ट्वा प्राहसन्पृथुलोचनाः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति