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वन पर्व
अध्याय १५
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कृष्ण उवाच
भ्राता वालश्च राजा च न च सङ्ग्राममूर्धनि |  १४   क
प्रमत्तश्च हतो वीरस्तं हनिष्ये जनार्दनम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति