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वन पर्व
अध्याय १५
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कृष्ण उवाच
आनर्तेषु विमर्दं च क्षेपं चात्मनि कौरव |  १८   क
प्रवृद्धमवलेपं च तस्य दुष्कृतकर्मणः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति