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विराट पर्व
अध्याय १५
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कीचक उवाच
स्वागतं ते सुकेशान्ते सुव्युष्टा रजनी मम |  १   क
स्वामिनी त्वमनुप्राप्ता प्रकुरुष्व मम प्रिय़म् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति