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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५३
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वासुदेव उवाच
विद्धि मह्यं सुतं धर्ममग्रजं द्विजसत्तम |  ११   क
मानसं दय़ितं विप्र सर्वभूतदय़ात्मकम् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति