द्रोण पर्व  अध्याय १६१

सञ्जय़ उवाच

हतान्गजान्समाश्लिष्य पर्वतानिव वाजिनः |  २०   क
गतसत्त्वा व्यदृश्यन्त तथैव सह सादिभिः ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति