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विराट पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
भर्तारमनुरुध्यन्त्यः क्लिश्यन्ते वीरपत्नय़ः |  ३२   क
शुश्रूषय़ा क्लिश्यमानाः पतिलोकं जय़न्त्युत ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति