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विराट पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
शुशुभे वदनं तस्या रुदन्त्या विरतं तदा |  ३७   क
मेघलेखाविनिर्मुक्तं दिवीव शशिमण्डलम् ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति