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उद्योग पर्व
अध्याय १५
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शल्य उवाच
न मे क्रुद्धस्य पर्याप्ताः सर्वे लोकाः शुचिस्मिते |  १८   क
चक्षुषा यं प्रपश्यामि तस्य तेजो हराम्यहम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति