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उद्योग पर्व
अध्याय १५
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शल्य उवाच
स दिशः प्रदिशश्चैव पर्वतांश्च वनानि च |  २८   क
पृथिवीं चान्तरिक्षं च विचीय़ातिमनोगतिः |  २८   ख
निमेषान्तरमात्रेण वृहस्पतिमुपागमत् ||  २८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति