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उद्योग पर्व
अध्याय १५
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अग्निरु उवाच
वृहस्पते न पश्यामि देवराजमहं क्वचित् |  २९   क
आपः शेषाः सदा चापः प्रवेष्टुं नोत्सहाम्यहम् |  २९   ख
न मे तत्र गतिर्व्रह्मन्किमन्यत्करवाणि ते ||  २९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति