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भीष्म पर्व
अध्याय ३३
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सञ्जय़ उवाच
ततः स विस्मय़ाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जय़ः |  १४   क
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति