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भीष्म पर्व
अध्याय १५
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धृतराष्ट्र उवाच
तं हतं समरे भीष्मं महारथवलोचितम् |  २१   क
सञ्जय़ाचक्ष्व मे वीरं येन शर्म न विद्महे ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति