वन पर्व  अध्याय १०७

लोमश उवाच

न शक्तस्त्रिषु लोकेषु कश्चिद्धारय़ितुं नृप |  २२   क
अन्यत्र विवुधश्रेष्ठान्नीलकण्ठान्महेश्वरात् ||  २२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति