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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
ततो निक्षिप्य राजानं धृष्टद्युम्नाय़ पाण्डवः |  ५२   क
अभिवाद्य गुरुं ज्येष्ठं प्रय़यौ यत्र फल्गुनः ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति