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द्रोण पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
संवार्य तु रणे द्रोणः कुमारं वै महावलः |  २४   क
शरैरनेकसाहस्रैः कृतहस्तो जितक्लमः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति