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वन पर्व
अध्याय २१
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वासुदेव उवाच
न हय़ा न रथो वीर न यन्ता मम दारुकः |  २३   क
अदृश्यन्त शरैश्छन्नास्तथाहं सैनिकाश्च मे ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति