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द्रोण पर्व
अध्याय १५७
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सञ्जय़ उवाच
दुर्योधनस्य शकुनेर्मम दुःशासनस्य च |  १९   क
रात्रौ रात्रौ भवत्येषा नित्यमेव समर्थना ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति