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द्रोण पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
ततस्तु सिंहसेनस्य शिरः काय़ात्सकुण्डलम् |  ३७   क
व्याघ्रदत्तस्य चाक्रम्य भल्लाभ्यामहरद्वली ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति