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द्रोण पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
न दिशो नान्तरिक्षं च न द्यौर्नैव च मेदिनी |  ४६   क
अदृश्यत महाराज वाणभूतमिवाभवत् ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति