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द्रोण पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
नादृश्यत तदा राजंस्तत्र किञ्चन संय़ुगे |  ४७   क
वाणान्धकारे महति कृते गाण्डीवधन्वना ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति