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द्रोण पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
हय़ौघांश्च रथौघांश्च गजौघांश्च समन्ततः |  ५   क
अपातय़द्रणे राजञ्शतशोऽथ सहस्रशः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति