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द्रोण पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
नाकुलिस्तु शतानीको वृषसेनं समभ्ययात् |  ७   क
विव्याध चैनं दशभिर्नाराचैर्मर्मभेदिभिः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति