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कर्ण पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
आभाष्य चैनं मधुरमभि नृत्यन्नभीतवत् |  १२   क
प्राह प्रहरतां श्रेष्ठः स्मितपूर्वं समाह्वय़न् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति