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कर्ण पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
मुष्टिश्लिष्टाय़ुधाभ्यां च व्याय़ताभ्यां महद्धनुः |  १४   क
दोर्भ्यां विस्फारय़न्भासि महाजलदवद्भृशम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति