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कर्ण पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
पर्जन्य इव घर्मान्ते वृष्ट्या साद्रिद्रुमां महीम् |  ३०   क
आचार्यपुत्रस्तां सेनां वाणवृष्ट्याभ्यवीवृषत् ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति