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कर्ण पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
द्विपस्य पादाग्रकरान्स पञ्चभि; र्नृपस्य वाहू च शिरोऽथ च त्रिभिः |  ४०   क
जघान षड्भिः षडृतूत्तमत्विषः; स पाण्ड्यराजानुचरान्महारथान् ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति