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कर्ण पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
शिरश्च तत्पूर्णशशिप्रभाननं; सरोषताम्राय़तनेत्रमुन्नसम् |  ४२   क
क्षितौ विवभ्राज पतत्सकुण्डलं; विशाखय़ोर्मध्यगतः शशी यथा ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति