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शल्य पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
व्यदृश्यत तदा शल्यो युधिष्ठिरसमीपतः |  १०   क
रणे चन्द्रमसोऽभ्याशे शनैश्चर इव ग्रहः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति