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शल्य पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
वध्यमानेष्वनीकेषु मद्रराजेन पाण्डवः |  १४   क
अमर्षवशमापन्नो धर्मराजो युधिष्ठिरः |  १४   ख
ततः पौरुषमास्थाय़ मद्रराजमपीडय़त् ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति