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शल्य पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
मां वा शल्यो रणे हन्ता तं वाहं भद्रमस्तु वः |  २१   क
इति सत्यामिमां वाणीं लोकवीरा निवोधत ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति