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शल्य पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालानां सोमकानां मत्स्यानां च विशेषतः |  २७   क
प्रतिज्ञां तां च सङ्ग्रामे धर्मराजस्य पूरय़न् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति