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शल्य पर्व
अध्याय ३०
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युधिष्ठिर उवाच
यदि चापि समर्थः स्यास्त्वं दानाय़ सुय़ोधन |  ५२   क
नाहमिच्छेय़मवनिं त्वय़ा दत्तां प्रशासितुम् ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति