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शल्य पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
पुनश्चास्य धनुश्चित्रं गजराजकरोपमम् |  ४०   क
क्षुरेण शितधारेण प्रचकर्त नराधिपः ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति