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शल्य पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्मोहमनुप्राप्ते पुनरेव वृकोदरः |  ४२   क
यन्तुरेव शिरः काय़ात्क्षुरप्रेणाहरत्तदा ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति