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वन पर्व
अध्याय २१४
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मार्कण्डेय़ उवाच
अचिन्तय़न्ममेदं ये रूपं द्रक्ष्यन्ति कानने |  ८   क
ते व्राह्मणीनामनृतं दोषं वक्ष्यन्ति पावके ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति