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शल्य पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
साश्वारोहांश्च तुरगान्पत्तींश्चैव सहस्रशः |  ५१   क
व्यपोथय़त सङ्ग्रामे क्रुद्धो रुद्रः पशूनिव ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति