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शल्य पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
शून्यमाय़ोधनं कृत्वा शरवर्षैः समन्ततः |  ५२   क
अभ्यद्रवत मद्रेशं तिष्ठ शल्येति चाव्रवीत् ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति