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शल्य पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
ततस्तौ तु सुसंरव्धौ प्रध्माप्य सलिलोद्भवौ |  ५४   क
समाहूय़ तदान्योन्यं भर्त्सय़न्तौ समीय़तुः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति