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शल्य पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
व्यदृश्येतां तदा राजन्कङ्कपत्रिभिराहवे |  ५६   क
उद्भिन्नरुधिरौ शूरौ मद्रराजय़ुधिष्ठिरौ ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति