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वन पर्व
अध्याय २८४
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कर्ण उवाच
व्रतं वै मम लोकोऽय़ं वेत्ति कृत्स्नो विभावसो |  २५   क
यथाहं द्विजमुख्येभ्यो दद्यां प्राणानपि ध्रुवम् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति