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शल्य पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
प्रदक्षिणमभूत्सर्वं धर्मराजस्य युध्यतः |  ६१   क
ततः शरशतं शल्यो मुमोचाशु युधिष्ठिरे |  ६१   ख
धनुश्चास्य शिताग्रेण वाणेन निरकृन्तत ||  ६१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति