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शल्य पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
सोऽन्यत्कार्मुकमादाय़ शल्यं शरशतैस्त्रिभिः |  ६२   क
अविध्यत्कार्मुकं चास्य क्षुरेण निरकृन्तत ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति