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शल्य पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
ततो मद्राधिपं द्रौणिरभ्यधावत्तथाकृतम् |  ६५   क
आरोप्य चैनं स्वरथं त्वरमाणः प्रदुद्रुवे ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति