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उद्योग पर्व
अध्याय १०५
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नारद उवाच
स भवानेतु गच्छाव नय़िष्ये त्वां यथासुखम् |  १९   क
देशं पारं पृथिव्या वा गच्छ गालव माचिरम् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति