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वन पर्व
अध्याय ८२
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पुलस्त्य उवाच
ततः सन्ध्यां समासाद्य विद्यातीर्थमनुत्तमम् |  ४७   क
उपस्पृश्य च विद्यानां सर्वासां पारगो भवेत् ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति