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शान्ति पर्व
अध्याय १५०
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भीष्म उवाच
शोषय़त्येव पातालं विवान्गन्धवहः शुचिः |  १२   क
ह्रदांश्च सरितश्चैव सागरांश्च तथैव ह ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति