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शान्ति पर्व
अध्याय २१२
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भीष्म उवाच
तमसा हि प्रतिच्छन्नं विभ्रान्तमिव चातुरम् |  ५   क
पुनः प्रशमय़न्वाक्यैः कविः पञ्चशिखोऽव्रवीत् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति